Hamara Hathras

16/05/2024 2:00 pm

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नई दिल्ली 02 मई । बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि आयुर्वेद के भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है। हाल में कंपनी ने इसके लिए माफी भी मांगी है। लेकिन फार्मा इंडस्ट्री ऐसे वाहियात विज्ञापनों से भरी पड़ी है। उन पर कौन लगाम लगाएगा। साक्ष्य-आधारित दवाइयां तीन स्तंभों के आधार पर बनाए जाती हैं- रोगी की पसंद, डॉक्टर अनुभव और हालिया उपलब्ध साक्ष्य। गलत सूचना इन तीनों को कमजोर करती है और यही बात सुप्रीम कोर्ट में चल रहे पतंजलि के मामले को क्रिटिकल बनाती है। इस सप्ताह सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में उत्तराखंड राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण ने कहा कि उसने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनी दिव्य फार्मेसी के 14 उत्पादों के मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस निलंबित कर दिए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि यह कार्रवाई तब की गई जब सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के खिलाफ कार्रवाई न करने के लिए राज्य प्राधिकरण की तीखी आलोचना की।

नवंबर 2023 में, पतंजलि ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि वह अब अपने अपने उत्पादों के विज्ञापन या ब्रांडिंग में किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं करेगी। साथ ही दवा के असर का दावा करने वाले या किसी भी चिकित्सा प्रणाली के खिलाफ कोई भी किसी भी रूप में मीडिया को जारी नहीं किया जाएगा। लेकिन कंपनी ने भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित करना जारी रखा। इनमें उच्च रक्तचाप और मधुमेह सहित कई हेल्थ कंडीशंस के इलाज का झूठा वादा किया गया और साथ ही पश्चिमी चिकित्सा की विफलताओं की आलोचना भी की। इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया था। कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वाले उत्पादों के विज्ञापन प्रकाशित करना जारी रखा था जबकि नवंबर में उसने कोर्ट को अंडरटेकिंग दी थी। इसके बाद पतंजलि को प्रमुख समाचार पत्रों में बिना शर्त माफी भी प्रकाशित करनी पड़ी।

पतंजलि से आगे

पतंजलि के विज्ञापनों में यह भी दावा किया गया है कि उन्होंने शोध के माध्यम से अपने फॉर्मूलेशन की प्रभावकारिता को साबित किया है। ऐसे कई शोध उद्धरणों के साथ समस्या यह है कि इनमें जरूरी शर्तों का अभाव है और यह विभिन्न बीमारियों के ‘इलाज’ के दावों को साबित करने के लिए नाकाफी हैं। इस खास फार्मा उद्योग में पेटेंट और मालिकाना दवाओं से जुड़ी समस्या है। इन फॉर्मूलेशन का उल्लेख आयुर्वेद की शास्त्रीय पाठ्यपुस्तकों में नहीं किया गया है लेकिन इनमें अलग-अलग मात्रा और संयोजन में बताए गए तत्व शामिल हैं। साथ ही फॉर्मूलेशन का लाइसेंस देने के लिए विभिन्न राज्य प्राधिकरणों द्वारा निर्धारित सुरक्षा और प्रभावकारिता मानक भी बहुत कड़े नहीं हैं।

शास्त्रीय आयुर्वेद की पाठ्यपुस्तकों में सीधे दर्ज किए गए फॉर्मूलेशन में भारी मात्रा में धातु और अन्य संभावित विषाक्त अवयवों की मौजूदगी के कारण इनकी सेफ्टी पर पहले से ही बहस चल रही है। नए फॉर्मूलेशन को बाजार में लाने से पहले विश्वसनीय डेटा की आवश्यकता होती है। हाल में यूपी ने 30 से अधिक आयुर्वेद उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसकी वजह यह थी कि इनमें से कई उत्पादों में स्टेरॉयड, दर्द निवारक और ओरल हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट पाए गए थे। पब्लिक हेल्थ के लिए आगे के जोखिम से बचने के लिए आयुर्वेद प्रतिष्ठान को नकली और मिलावटी उत्पादों के मुद्दे पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

आयुर्वेद से आगे

यह समस्या सिर्फ आयुष क्षेत्र तक सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में फार्मा उद्योग में व्यावसायिक हितों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने वाले कई मामले सामने आए हैं। केवल पतंजलि पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय इस बहस को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कुछ ऐसे हालिया मामलों पर विचार करें जो उद्योग और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संघर्ष को उजागर करते हैं। ब्रिटिश-स्वीडिश बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने हाल ही में अदालती दस्तावेजों में स्वीकार किया कि उसके कोविड वैक्सीन से एक दुर्लभ दुष्प्रभाव थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (Thrombosis with thrombocytopenia syndrome) हो सकता है। टीटीएस रक्त के थक्के बना सकता है जो डीप वेन थ्रोम्बोसिस, दिल के दौरे और स्ट्रोक का कारण बन सकता है। यह दुष्प्रभाव सभी एडेनोवायरस वेक्टर-आधारित टीकों के लिए जाना जाता है। कई देशों ने इसका पता चलते ही इन टीकों को रोक दिया या एज-रेस्टिक्टेड कर दिया।

टाइटन पर काबू

इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देती है लेकिन वाणिज्यिक हितों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। इंडस्ट्री किसी भी हालत में हेल्थ को हल्के में नहीं ले सकती है। चुनावी बॉन्ड का डेटा दवा उद्योग और राजनीतिक दलों के बीच संभावित सांठगांठ की ओर इशारा करता है। जीवनशैली में बदलाव, शारीरिक गतिविधि और डायटरी मॉडिफिकेशन से जुड़ी नॉन-फार्मा गतिविधियों की तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता है क्योंकि कोई उनका प्रचार नहीं करता है।

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