बेचारे मजदूर चले थे पैदल ही अपने घर को।
किसे पता था देखेंगे खुद के ही मौत के मंजर को।।
बनकर काल मालगाड़ी ने रौंद दिया क्षण भर में ही।
जीवनलीला खत्म हो गयी यात्रा रही अधर में ही।।

पास बँधी जो रूखी सूखी कहीं रोटियाँ बिखरी गयीं।
लथपथ लथपथ सने खून की कहीं बोटियाँ बिखर गयीं।।
दर्द चीख आँसू पीड़ा का पटरी पर कोहराम हुआ।
मानो मृत्यु और जीवन का आपस में संग्राम हुआ।।

घरवालों का इंतजार अब नहीं पूर्ण हो पायेगा।
कैसे उनका कोई परिजन मन को धीर बँधायेगा।।
जाने कितने बच्चे उनके दुखी अनाथ हुए होंगे।
जीवन भर को उनके आँसू उनके साथ हुए होंगे।।

बहुत बड़ी भीषण दुर्घटना सोलह लोगों का मरना।
जन जन का दिल चीर रही है सहसा घटित हुई घटना।।
दिल करुणा में डूब डूबकर शोकमग्न हो जाता है।।
अनदेखा ही दृश्य आँख में जीवित होकर आता है।।

आत्मशांति की करें प्रार्थना हे ईश्वर! तुम सुन लेना।
शोक सहन करने ताकत भी हर परिजन को देना।।
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि इनको अर्पित करती नम आंखें।
बार-बार गम के सागर से करुणा भरती नम आँखें।।

                                                                                  अवशेष मानवतावादी