गीत
सौंप रहा हूँ एक तपस्या का प्रतिफल इन पन्नों में।
मेरा क्या है सिर्फ लेखनी का है बल इन पन्नों में।।

जब सद्गुरु की कृपा हुई तो
गूढ़ ज्ञान के पृष्ठ खुले।
उनके अंदर चिंतन मंथन
और मनन के बिंदु घुले।।

निकला मानव की जिज्ञासाओं का हल इन पन्नों में।
सौंप रहा हूँ एक तपस्या का प्रतिफल इन पन्नों में।

जब औरों की पीड़ा ने
मेरी पीड़ा को बढ़ा दिया।
तो चिंतन की धारा को
चेतना शिखर पर चढ़ा दिया।।

सालों साल बिताए मैंने, हैं वे पल इन पन्नों में।
सौंप रहा हूँ एक तपस्या का प्रतिफल इन पन्नों में।

दिव्य साधना के सोपानों
में संघर्ष बहुत आये।
लेकिन हुई साधना पूरी
हम ईश्वर से मिल पाये।।

पढ़कर देखो है शब्दों का ज्ञान महल इन पन्नों में।
सौंप रहा हूँ एक तपस्या का प्रतिफल इन पन्नों में।

– अवशेष