की अगुवानी महल ने, हुआ हास परिहास ।
लगे छलकने शिशिर में,मदिरा भरे गिलास ।।-1

देव दिवाकर धूप की, भेजें चादर आप ।
होरी करता रात भर,धूप-धूप का जाप ।।-2

कँपी रात भर झोपड़ी, गर्म रहे प्रासाद ।
ठिठुर-ठिठुर दुखिया करे,जाड़े का अनुवाद ।।-3

भरी पेटियां शीत की, आयीं मेरे गाँव ।
तपने लगे अलाव पर,कई घरों के पाँव ।।-4

निष्ठुर मारे नारि को, ज्यों कोड़ों की मार ।
शीत प्रकृति पर कर रहा, ऐसा तेज प्रहार ।।-5

लक्ष्मण रेखा खींच कर, सो जाते प्रासाद ।
लाँघ उसे कब जा सका,जाड़े का उन्माद ।।-6

वर्षा और समीर से, शीत हुआ बलवान ।
काँप-काँप कर कट रहा,रात और दिनमान ।।-7

भूखी सोये झोपड़ी, काँपे सारी रात ।
होरी का दिनमान क्या, बुरे हुए हालात ।।-8

सर्द पेटियां शिशिर की,लाया पवन तुरंग ।
जीव-जंतु कपने लगे, छिपने लगे भुजंग ।।-9

हाय ! निगोड़े शीत को,ऐसा चढ़ा जुनून ।
हँसते-खिलते जगत के,तोड़े मधुर प्रसून ।।-10

वसुधा ने जब ओढ ली,कुहरा वाली सौर ।
तब युग्मों में चल पड़ा,मधुर प्रेम का दौर ।।-11

क्यों देता जग को शरद, हँस-हँस गहरी पीर ।
तेरा मधुऋतु रश्मियां, कर देगीं आखीर ।।-1

✍ शिव कुमार ‘दीपक’ बहरदोई,सादाबाद
हाथरस (उ०प्र०)