हनुमानजी के जन्म की कथा बहुत ही गहन विषय है। भगवान के अवतार की ही तरह हनुमानजी के अवतरण का स्थान भी अंत:करण ही है । भीतर हनुमानजी उतर आएँ तभी भगवान का कार्य संपूर्ण होता है । देखें, हनुमानजी का प्राकट्य अंजनि से हुआ । तो हनुमानजी को हृदयदेश में प्रकट करने के लिए हमें ही अंजनि होना पड़े । अंजनि कौन है ? जिसने अपनी आँखों में अंजन लगा लिया वो अंजनि । यह कौन सा अंजन है ? और करता क्या है ?
“गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन ।
नयन अमिय दृगदोष विभंजन ॥”
गुरुजी के चरणों की धूल ही अंजन है, यह नेत्रों के दोषों को दूर कर देता है । अब ध्यान दें कि यह धूल क्या है ?
“पद पदम पराग सरस अनुरागा”
गुरुजी के चरणों में जीवित प्रेम हो जाना ही उनके चरणों की धूल मिल जाना है, यही अंजन लग जाना है, और यही साधक का अंजनि हो जाना है ।
इधर शंकर कौन हैं ? आपके गुरुजी- “वंदे बोधमयं नित्यं गुरूं शंकर रूपिणम्”
शंकर रूपी सद्गुरुदेव ने जब त्रिदेह रूपी त्रिलोक से माया का लोप कर दिया, तब उनमें से जो तेज निकला, ज्ञान झरने लगा, उपदेश निःसृत होने लगा, वह तेज वायु के माध्यम से अंजनि के कान में पड़ा । आपके भी कान में गुरुजी का उपदेश वायु के माध्यम से ही तो पड़ता है, इसमें हैरानी क्या है ?
तो शंकर रूपी आत्मज्ञानी महापुरुष सद्गुरुदेव का यह उपदेश पड़ता तो सबके कानों में है, वायुदेव ही डालते हैं, पर ज्ञान-वैराग्य रूपी हनुमानजी का प्राकट्य उसी के अंत:करण में होता है जिसका की उन गुरुजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, जो प्रेम युक्त, अंजन युक्त नेत्रों वाला है, जो अंजनि है ।
जो अंजनि नहीं है, वह बेचारा वंचित ही रह जाता है, तर्क करता ही रह जाता है, अंजनि हुए बिना उसे हनुमानजी की प्राप्ति होनी संभव नहीं ।