हाथरस 04 जुलाई | आज सुंदरकांड प्रारम्भ करने से पहले लंका का निरूपण-
लंका, शरीर, पृथ्वी, जगत, संसार, त्रिलोक और देह, ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। त्रिदेह- स्थूल, सूक्ष्म, कारण, और उनकी तीन अवस्थाएँ- जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, यही लंका है। इसे “मन” रूपी मय दानव ने बनाया है।
“रचित मन दनुज मय रूपधारी”
इस देह रूपी लंका में पाँच रहते हैं, मोह- रावण, अहंकार- कुंभकर्ण, काम- मेघनाद, वासना- सूर्पनखा, और इन चारों से त्रस्त पाँचवाँ, जीव- विभीषण।
यह विभीषण हम ही हैं, हम पूजा पाठ आदि तो करते हैं पर मोहादि द्वारा किए जा रहे अनाचार, दुराचार, पापाचार को चुनौती नहीं दे पाते, कारण कि आत्मबल नहीं है। यह विभीषण जिन सीताजी का मंदिर बनाकर पूजा करता है, वही सीताजी साक्षात ग्यारह महीने से, अशोक वाटिका में बंदी पड़ी हैं, दिन रात त्रास सहती हैं, बताइए विभीषण ने क्या किया?
और ऐसा भी नहीं कि वह जानता न हो, हनुमानजी को सीताजी का पता इसी ने बताया, पर जानते हुए भी अन्जान सा रहता है। यही हमारे साथ है, जानते हम भी हैं पर करते कुछ नहीं।
“हाए आसार बुढ़ापे के हुए जाते हैं,
और हम दिन की तरह रोज ढले जाते हैं।
शर्म तो ये है के सब जानकर अन्जान हुए,
और अब भी उसी माया पे मरे जाते हैं।।”
बस यही जीव का स्वभाव, उसे बंधन में डाले है। जीव ऊपर ऊपर, पूजा, पाठ, जप, तप, व्रत, नियम, तीर्थ, दान आदि करता है, पर भीतर वासना का नंगा नाच चलता ही रहता है।
उसके थोड़े बहुत टूटे फूटे, नामजप आदि के प्रभाव से, जब पुण्य का पुञ्ज फल देने को एकत्र होता है, तब उसे संत से मिलन का सौभाग्य लाभ होता है।
“पुण्य पुञ्ज बिनु मिलहिं न संता”
जब हनुमानजी रूपी संत ने आकर मंत्र दिया,”तुम्हरो मंत्र विभीषण माना” तब
विभीषण ने पहली बार, आत्मबल जुटा कर, रावण के सामने विरोध का स्वर उठाया, लात तो खाई पर भगवान की शरण में पहुँच गया।
हम तो कितनी ही लात खा चुके, पर
“हजार बार जिस गली से होकर जलील निकले।
लेकर चला मचलकर कमबख़्त दिल वहीं पर।।”